Top 5 motivational story in hindi (new)

एक समय की बात है एक गांव में एक मूर्तिकार रहा करता था Motivational वह खूब सुंदर मूर्ति बनाया करता था और वह मूर्तिकार मूर्ति बनाकर अच्छे पैसे कमा लिया करता था और उसका एक बेटा भी था जो बचपन से ही मूर्ति बनाने का काम करना शुरू कर देता है

बेटा भी बहुत अच्छी मूर्ति बनाया करता था और बाप अपने बेटे की कामयाबी से बहुत ही खुश था लेकिन वह अपने बेटे की मूर्ति में हर बार कोई न कोई कमी निकाल दिया करता था वह कहता था बहुत ही अच्छी मूर्ति बनाई है

पर अगली बार बनाते समय इस कमी को दूर कर देना और बेटा भी अपने बाप की बात को मान लिया करता था बेटा कभी किसी चीज की शिकायत नहीं करता हूं अपने बाप की कही हुई चीज का पालन करता था  वह लगातार अपनी मूर्ति को बेहतर बनाने की कोशिश करता था

इस लगातार सुधार के कारण बेटे की मूर्ति बाप से भी अच्छी बनने लगी और ऐसा टाइम भी आ गया कि लोग बेटे की मूर्ति को अच्छे कीमत पर खरीदने लगे और उसकी प्रशंसा भी करने लगे और बाप की मूर्तियां उसी कीमत पर बिकती रही लेकिन बाप बेटे की मूर्तियों में कोई ना कोई कमी निकाल ही दिया करता था

लेकिन बेटे को यह सब सही नहीं लगता था और ना चाहते हुए भी वह इन सब चीजों को मान लिया करता था और अपनी मूर्तियों में निरंतर सुधार करता रहता था  एक समय ऐसा भी आया जब बेटे के सब्र ने जवाब दे दिया

जब बाप बेटे की मूर्ति में कमी निकाल रहा था और बेटा कहने लगा हूं आप तो ऐसे कहते हैं जैसे कि आप बहुत बड़े मूर्तिकार है अगर आपको इतने ही समझ होती तो आप की मूर्ति कम कीमत पर ही नहीं बिकती

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अब मुझे आपकी सलाह की जरूरत नहीं है मैं अपनी समझ से मूर्ति बना सकता हूं और जब अपने बेटे की यह बात सुनी तो उसने मूर्तियों में कमी निकालना बंद कर दिया और अपने बेटे को सलाह देना भी बंद कर दिया लेकिन कुछ महीने में लड़का अपनी मूर्ति को उसी प्रकार बेचता रहा

लेकिन कुछ महीनों बाद उसने यह नोटिस किया कि उसकी मूर्तियां बिकना कम हो गई है और उसकी मूर्तियों की प्रशंसा अब लोगों द्वारा नहीं की जा रही है और उसकी मूर्ति की कीमत भी कम होने लगी कुछ समय तो उस लड़के को समझ ही नहीं आया यह सब क्या हो रहा है और कुछ समय बाद अपने बाप के पास गया और अपने बाप को इस समस्या के बारे में बताया

बाप ने बेटे को बहुत ही शांति से सुना जैसे कि बाप को पता था कि यह दिन अवश्य आएगा और बेटे ने भी अपने बाप से पूछो कि आपको पता था कि ऐसा होगा और अगर आपको पता था तो आपने मुझे पहले क्यों नहीं बताया और बाप ने जवाब दिया

उस समय तुम समझना ही नहीं चाहते और मैं यह भी जानता हूं कि तुम्हारे जितनी अच्छी मूर्ति मैं नहीं बनाता हूं और यह भी हो सकता है कि मूर्तियों के बारे में मेरी सलाह भी गलत हो और ऐसा भी नहीं है कि मेरी सलाह के वजह से तुम्हारी मूर्ति बेहतर बनी है लेकिन जब मैं तुम्हारी मूर्तियों में कमियां निकालता था

तब तुम अपनी बनाई गई मूर्ति से संतुष्ट नहीं होते और उसे बेहतर बनाने की कोशिश किया करते थे और वही बेहतर होने की कोशिश तुम्हारी कामयाबी का कारण है और जिस दिन आप अपने काम से संतुष्ट हो गए और तुमने यह मान लिया इसमें बेहतर होने की गुंजाइश ही खत्म हो गई है

तो फिर तुम्हारी प्रगति (Growth) ही रुक जाएगी और लोग तुमसे बेहतर की उम्मीद करते हैं और यही कारण है कि तुम्हारी मूर्तियों की तारीफ नहीं होती और ना ही तुम्हें अपनी बनाई हुई मूर्तियों के ज्यादा कीमत मिलती है और फिर बेटे ने सवाल किया कि अब मुझे क्या करना चाहिए

तो बाप ने जवाब दिया कि असंतुष्ट होना सीख लो और मान लो कि तुम में बेहतर होने की गुंजाइश बाकी है यही एक तुम्हें आगे बेहतर बनाने में सहायता करेगी और तुम्हें हमेशा बेहतर बनाएगी

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कहानी से शिक्षा : अगर हमें अपनी जिंदगी में आगे बढ़ना है तो हमें कभी भी अपने आपको संतुष्ट नहीं करना चाहिए क्योकि जिस दिन हम अपनी सफलताओ से संतुष्ट हो जायेंगे उस दिन हमारी जिंदगी रुक जाएगी और हमे कुछ भी पाने की जिज्ञासा नहीं होगी

इसलिए अपने अन्दर की भूख को हमेशा जगाये रखो ताकि जिंदगी में कुछ अच्छा कर पाओ नहीं तो एक दिन तुम भी दूसरो की तरह अपनी किस्मत और समय को कोश रहे होगे

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 बहुत समय पहले की बात है कि किसी गांव में बाबूराम नाम का एक पेंटर रहा करता था वह बहुत ही ईमानदार था परंतु गरीब होने के कारण वह घर घर जाकर लोगों के घर पेंट किया करता था उसकी आमदनी बहुत कम थी पूरा दिन काम करने के बाद वह दो वक्त की रोटी खा पाता था

वह हमेशा यह सोचता रहता था कि मुझे कोई बड़ा काम मिले जिससे कि मैं अपना जीवन अच्छे से व्यतीत कर सकूं परंतु वह छोटे-छोटे काम भी बहुत लगन और ईमानदारी से करता था वह किसी को यह कहने का मौका नहीं देता था कि मेरे किए गए काम में कोई कमी है

 एक दिन बाबूराम को गांव के जमींदार ने बुलाया बाबूराव जमींदार के पास  पहुंचता है जमींदार कहता है बाबूराम मैंने तुम्हें बहुत जरूरी काम के लिए बुलाया है और जमींदार कहता है कि मैंने तुम्हें यहां अपनी नाव पेंट करने के लिए बुलाया है क्या तुम यह काम करोगे बाबूराम जमींदार से कहता है जरूर जमींदार साहब मैं करूंगा

जमींदार बाबूराम से यह पूछता है की तुम पेंट करने के कितने रुपए लोगे बाबूराम कहता है पूरा खर्चा मिलाकर 15 सो रुपए होंगे जमींदार कहता है चलो ठीक है लेकिन तुम्हें यह काम एक ही दिन में करना होगा बाबूराम कहता है ठीक है मैं एक ही दिन में आपकी नाव पेंट कर दूंगा जमींदार बाबूराम को नाव दिखा देता है और जमींदार वहां से चला जाता है

बाबूराम नाव पेंट कर ही रहा था कि वह देखता है कि नाव में छेद है और बाबूराम मन ही मन में सोचता है कि इसे अगर ऐसे ही पेंट कर दूंगा तो यह डूब जाएगी और फिर बाबूराम पहले उस छेद को सही तरीके से बंद करता है और फिर पेंट करना शुरू करता है शाम तक वह पूरी नाव को पेंट कर देता है और जमींदार के पास जाता है और जमींदार से कहता है

जमींदार साहब आपकी नाव पेंट हो चुकी है एक बार चल कर देख लो जमींदार नाव को देखने जाता है और बाबूराम से कहता है वाह तुमने तो नाव को पूरी तरह ही बदल दिया है और जमींदार बाबूराम से कहता है कल शाम को आकर अपने पैसे ले जाना बाबूराम कहता है ठीक है साहब

अगले दिन जमींदार के परिवार वाले उसी नाव में घूमने नदी के उस पार जाते हैं और जमींदार उन सभी को बैठाकर घर आ जाता है और जब जमींदार घर आता है तो वह देखता है कि उसका नौकर जो उस नाव की देखभाल करता था वह छुट्टी पर से वापस आ गया है वह नौकर जमींदार को घर पर अकेले देखकर परिवार वालों के बारे में पूछने लगता है तो जमींदार कहता है कि सब लोग नाव में नदी के उस पार घूमने गए है

इतना सुनते ही वह नौकर चिंतित हो जाता है नौकर को चिंतित एक जमींदार नौकर से पूछता है क्या हुआ तुम इतना चिंतित क्यों हो नौकर जमींदार से कहता है कि उस नाव में छेद था इतना सुनते ही जमींदार बहुत ज्यादा चिंतित हो जाता है और वह नदी की तरफ जा ही रहा था कि वह दिखता है कि उसके परिवार वाले घर की तरफ आ रहे हैं

इतना देखते ही वह बहुत खुश हो जाता है और जब शाम को बाबूराम अपने मेहनत के पैसे लेने आता है तो जमींदार उसे पैसे देता है और जब बाबूराम पैसे गिनता है तो पैसे बहुत ज्यादा होते है और बाबूराम कहता है जमींदार साहब आपने मुझे गलती से ज्यादा पैसे दे दिए हैं जमींदार कहता है नहीं यह पैसे मैंने तुम्हें जानबूझकर दिए हैं

बाबूराम पूछता है बात तो सिर्फ 15 सो रुपए की हुई थी और यह तो 50000  है जमींदार बाबूराम से कहता है कि तुमने बहुत बड़ा काम किया है तुमने नाव का छेद बंद करके मेरी परिवार वालों की जान बचाई है  तुम नाव का छेद बंद करने के लिए अलग से पैसे मांग सकते थे परंतु तुमने इसके लिए भी कोई पैसा नहीं मांगा इसीलिए मैं तुम्हारे इस काम से बहुत ही खुश हूं और यह तुम्हारे मेहनत के पैसे हैं और तुम इसे रख लो और बाबूराव वह पैसे लेकर बहुत ही खुश हुआ और खुशी-खुशी अपने घर को चला गया

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  सीख- इस  कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें अपना काम पूरी ईमानदारी से करना चाहिए और अपने काम को इतना बेहतर बनाना चाहिए कि दूसरों को कभी शिकायत का मौका नहीं देना चाहिए

क्योकि कई बार ऐसा होता है जब हम किसी और का काम कर रहे होते है और हम उस काम को सही ढंग से नहीं करते क्योकि वो हमारा अपना काम होता ही नहीं इसके विपरीत अगर हम अपना कोई भी काम कर रहे होते है तो हम उसमे किसी भी तरह की गलती होने की गुंजाईस ही नहीं छोड़ते

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किसी राज्य में पृथ्वी सिंह नाम का एक बड़ा दयालु राजा रहा करता था और राजा की 1 बेटी भी थी और जिसका नाम जानवी था राजकुमारी जानवी बहुत ही घमंडी थी राजकुमारी को अपनी खूबसूरती पर बहुत ही घमंड था राजा पृथ्वी सिंह अपनी बेटी के लिए योग्य वर की तलाश कर रहे थे क्योंकि उन्हें यह लगता था एक बार राजकुमारी की शादी हो जाएगी तो उनके बर्ताव और व्यापार दोनों में सुधार आ जाएगा

एक दिन राजा पृथ्वी सिंह अपनी बेटी के लिए स्वयंवर का आयोजन करते हैं वहां पर कई राज्यों के राजा आते हैं राजा पृथ्वी सिंह अपनी बेटी जानवी को स्वयंवर में बुलाते हैं और उनसे वर चुनने को कहते हैं राजकुमारी जानवी दरबार में आती है और सभी राजाओं के बेइज्जती करना शुरू कर देती है

राजकुमारी का ऐसा व्यवहार देखकर राजा पृथ्वी सिंह बहुत ही गुस्सा हो गए और उन्होंने यह एलान कर दिया की कल जो भी प्रवेश दरबार में से अंदर आएगा उसी के साथ तुम्हारा विवाह कर दिया जाएगा चाहे वह कोई भिखारी हो या महाराज इतना सुनते ही राजकुमारी जानवी हैरान हो गई और कल प्रवेश दरबार में सबसे पहले एक भिखारी आता है

जिसे राजा सिपाहियों से कह कर बुला लिया करता है और राजा भिखारी से कहता है की मैं अपनी पुत्री का विवाह तुम्हारे साथ करूंगा इतना सुनते ही वह भिखारी अचंभित हो जाता है और खुश भी हो जाता है

और जैसे ही राजकुमारी जानवी को इस बात का पता चलता है वह इस शादी से मना कर देती है परंतु उसके पिता इस बात पर अड़े रहते हैं राजा पृथ्वी सिंह कहते हैं कि तुम्हारी शादी इसी भिखारी से होगी जा कर तैयार हो जाओ और महाराज पृथ्वी सिंह अपनी पुत्री और भिखारी की शादी करवा देते  है

और राजकुमारी जानवी को महल से विदा कर देते हैं राजकुमारी जानवी और भिखारी दोनों ही महल से बाहर  जाते हैं और पैदल चलना शुरू कर देते हैं कुछ ही समय में वह अच्छी खासी दूरी तय कर लेते हैं फिर वह एक बहुत ही सुंदर घाटी में पहुंच जाते हैं रानी जानवी अपने पति( भिखारी) से पूछती है यह घाटी किसकी है तो उसका पति

( भिखारी)  जवाब देता है और कहता है यह घाटी राजा विक्रम की है थोड़ा पैदल चलने के बाद  वह दोनों शहर की तरफ आ जाते हैं और फिर रानी जानवी अपने पति से पूछती है यह शहर किसका है तो उसके पति उत्तर देते हैं यह शहर भी राजा विक्रम का है रानी जानवी यह सब सुनकर पछताने लगती है

और सोचती है कि मेरे घमंड ने मुझे कहां से कहां पहुंचा दिया मध्य मध्य चलते चलते वह दोनों एक छोटे से घर की तरफ जाते हैं और महारानी जानवी कहती है यह किसका घर है तो उसके पति( भिखारी) कहते हैं कि यह मेरा घर है और तुम्हें भी अब यहीं पर रहना है

महारानी जानवी कहती है यहां पर तो कोई सेवक भी नहीं है उसके पति( भिखारी) कहते हैं  अब तुम्हें ऐसे ही रहने की आदत डालनी पड़ेगी रानी मैंने आज तक कोई भी काम नहीं किया था इसीलिए वह घर का कोई भी काम ठीक ढंग से नहीं कर पाती थी ना वह ढंग से रोटी बना पाती थी और ना ही कोई और काम कर पाती हैं

इसीलिए उसके पति( भिखारी)  कहते है कि हमें जीवन व्यापन करने के लिए कुछ ना कुछ काम तो करना पड़ेगा मैं अपना काम करूंगा और तुम अब से राजा विक्रम के दरबार में सेविका का काम करोगे और अगले दिन से रानी जानवी राजा विक्रम के दरबार में सेविका का काम करने लगी

रानी जानवी दरबार में साफ सफाई का काम करने लगी और दिन के अंत में उसे कुछ खाना घर ले जाने को मिल जाता था और ऐसे ही कुछ दिन बीत जाते हैं और राजा विक्रम की विवाह की तारीख पक्की हो जाती है और महल में सजाने का काम शुरू हो जाता है और यह सब देख कर राजकुमारी जानवी भी बहुत ही उदास हो जाती है और कहती है कि काश मैंने इतना घमंड दिखा कर राजा विक्रम का अपमान नहीं किया होता

और वह अपने किए गए काम पर बहुत पछताती है इतना सुनते ही पीछे खड़े राजा विक्रम कहते हैं क्या तुमने मेरा नाम लिया राजकुमारी जानवी कहती है प्रिय राजा मुझे अपने द्वारा किए गए घमंड पर बहुत पछतावा है और मुझे माफ कर दो इतना सुनते ही राजा विक्रम कहते हैं तुम चिंता मत करो और मेरे साथ चलो

राजा विक्रम राजकुमारी जानवी को वहां ले जाते हैं जहां शादी की तैयारी चल रही होती है और वह दोनों जैसे ही उस कमरे में पहुंचते हैं  राजकुमारी जानवी देखती है कि जिन राजाओं का अपमान राजकुमारी जानवी ने किया था वह सब वहां बैठे हुए थे और उनके साथ उनके पिता महाराज पृथ्वी सिंह भी बैठे हुए थे

और महारानी जानवी कहती है कि मुझे मेरी गलती के लिए माफ कर दीजिए राजा विक्रम कहते हैं राजकुमारी आपको अपनी गलती का एहसास है इससे बड़ी कोई और बात नहीं हो सकती और मैं आपको यह बताना चाहूंगा कि मैं वही भिखारी हूं कि जिससे आपकी शादी हुई थी और इतने दिनों से आप मेरे साथ रह रही थी

मैंने यह सब इसलिए किया था ताकि आपको आपकी गलती का एहसास हो जाए और मैं यह भी बताना चाहता था की घमंड दुनिया की सबसे बड़ी बुराई है

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सीख-  इस कहानी से हमें क्या शिक्षा मिलती है कि हमें घमंड कभी नहीं करना चाहिए और दूसरों का अपमान भी नहीं करना चाहिए

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