birbal ki anokhi kahaniya

birbal stories – एक बार अकबर गहरी सोच में थे उन्हें देखने से ऐसा लग रहा था कि वह बहुत परेशान है वहां मौजूद एक दरबारी ने उनसे उनकी परेशानी का कारण पूछा तब अकबर ने दरबारी को बताया कि उनके बेटे सलीम को अंगूठा चूसने की एक गलत आदत है जैसे जैसे सलीम बड़े हो रहे हैं  जिसे लेकर वह बहुत परेशान है

लेकिन शहजादे सलीम बहुत जिद्दी है वह किसी की एक नहीं सुनते तब उस दरबारी ने अकबर को एक संत के बारे में बताया तथा दरबारी ने यह भी बताया कि यदि एक बार कोई उनकी बात सुन लेता है तो वह उनकी बात को इंकार नहीं करता और अपनी सारी बुराइयां  त्याग देता है

 दरबारी की बात सुनकर अकबर को अपनी परेशानी का हल संत में दिखा तथा अकबर ने संत को दरबार में लाने का आदेश दिया कुछ समय  बाद संत को दरबार में लाया गया उनका बहुत आदर सत्कार किया गया तब संत ने अकबर से दरबार में लाने का कारण पूछा अकबर ने उन्हें सलीम की अंगूठा चूसने की गलत आदत के बारे में बताया तथा उसके लिए कुछ उपाय करने को कहा

 अकबर और सभी दरबारी संत को आश्चर्य की नजरों से देख रहे थे कि वह सलीम के लिए क्या उपाय करते हैं लेकिन संत कुछ देर सोचने के बाद बोला कि उसे 1 हफ्ते का समय चाहिए और ऐसा कहकर वह बिना सलीम को मिले  चला गया उस समय दरबार में बीरबल भी मौजूद थे

 एक हफ्ते बाद संत दरबार में आया और उसने सबसे पहले सलीम को  बुलाया और बहुत देर तक सलीम के साथ बातें की और खेल खेल में उन्हें अंगूठा चूसने की गलत आदतों के बारे में बताया कि किस प्रकार अंगूठा चूसना सेहत के लिए हानिकारक है इसलिए उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए सलीम को यह सारी बातें समझ में आ गई और उन्होंने सबके बीच में अंगूठा ना चूसने की कसम खाई

 संत के द्वारा जो बातें सलीम को बताई गई थी वह बातें आम बात थी संत चाहता तो वह बातें दरबार में सबके सामने कह सकता था परंतु उसने 1 हफ्ते का समय लिया पर यह बातें अकबर और वहां मौजूद दरबारियों को हजम ना हुई और संत का ऐसा करना उन्होंने दरबार का तोहीन माना और वहां मौजूद दरबारियों ने अकबर से संत को सजा देने की मांग कर दी अकबर भी दरबारियों की बात से सहमत हुए

उन्होंने भी सजा देना तय किया लेकिन जैसा कि हमेशा की तरह अकबर कोई भी फैसला लेने से पहले बीरबल का मशवरा लेते थे उन्होंने इस बार भी बीरबल की तरफ देखा और पूछा कि आज तुम इतने खामोश क्यों बैठे हो क्या तुम्हें ऐसा कुछ नहीं लगता कि इस संत को सजा मिलनी चाहिए

 तब बीरबल खड़ा होता है और दरबार के बीच जाकर कहता है कि जहांपना मैं  बिल्कुल इस विषय में उल्टा सोच रहा हूं इसलिए मैं खामोश हूं और तभी सभा में हल्ला मच जाता  है सभी को आश्चर्य होता है कि उल्टा मतलब क्या होगा तभी बीरबल कहते हैं कि मेरे नजरों से यह संत  एक महान संत है हमें इनसे काफी कुछ सीख लेनी चाहिए

और इन्हें गुरु मानकर इनका आशीर्वाद भी लेना चाहिए और उनके साथ हुई  गुस्ताखियां की भी माफी मांगने चाहिए यह सुनकर सभा में मौजूद सभी को बहुत गुस्सा आ जाता है और दरबार में कोहराम मच जाता है तभी अकबर गुस्से में खड़े होकर कहते हैं कि बीरबल तुम हम सभी की तोहीन कर रहे हो कि हम उस संत से माफी मांगे

 तभी बीरबल कहता है कि जहांपना  मेरी गुस्ताखी को माफ करें लेकिन मेरे मुताबिक यह एक न्न्याय संगत हैं तभी अकबर बीरबल को कहते हैं कि अपने बात को साबित करो

तभी बीरबल दरबार में कहता है कि जब संत पहली बार दरबार में आए थे तो उनके हाथों में एक चूर्ण की डिबिया थी जिससे निरंतर संत चूर्ण निकाल कर खा रहे थे लेकिन जब आज वह दरबार में आए थे तो उनके हाथों में कोई डिबिया नहीं  थी क्योंकि जब आप उनसे शहजादे सलीम की गलत आदतों के बारे में बात करें थे

तो संत को भी अपनी गलत आदतों का एहसास हुआ और तभी उन्होंने 1 हफ्ते का समय अपने आप को सुधारने के लिए मांगा और अपने आप को सुधार कर उन्हें सलीम को भी ज्ञान दिया और बीरबल ने कहा कि ऐसे बहुत ही कम लोग होते हैं जो खुद की कमी को देखें और उसे सुधारे इसलिए मेरे हिसाब से यह एक महान संत है तभी सभी को यह बात समझ में आती है और वह  माफी मांगते हैं तथा उनका आशीर्वाद लेते हैं

 इस कहानी से हमें दो शिक्षा मिलती है

 पहली शिक्षा किसी को ज्ञान देने अथवा सीख देने से पहले अपने अंदर अवश्य जाकर क्या आप खुद उस ज्ञान के दायरे में जीवन व्यतीत करते हैं क्या आप में वह सभी गुण मौजूद है जिसका ज्ञान और दूसरे को दे रहे हैं अगर नहीं तो तो पहले खुद को सुधारें और फिर दूसरे को ज्ञान दे और यदि आप पहले खुद को सुधार नहीं सकते तो  आपको दूसरों को ज्ञान देने का कोई हक नहीं

 दूसरी शिक्षा  विचार को दोषी कहने लगते हैं हमेशा देखता है सत्य नहीं होता यह मिलती है कि दरबार में बिना विचार किए सभी संत को दोषी समझते हैं हमेशा जो दिखता है वह सत्य नहीं होता हर करने के पीछे कोई ना कोई कारण अवश्य होता है इसलिए एकदम से नकारात्मक भाव नहीं लाना चाहिए हमेशा परिस्थिति को  समझना चाहिए क्योंकि जो दिखता है

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हमेशा वास्तव में सच हो जरूरी नहीं कुछ भी करने से पहले सच जानना जरूरी है इसलिए मैंने कहा था उनका लिया गया निर्णय न्याय संगत है

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